चंडीगढ़, 23 मई
पंजाब में होने वाले निकाय चुनावों को सत्ता का सेमीफाइनल माना जा रहा है और इसी वजह से राज्य की सियासत पूरी तरह चुनावी रंग में रंग चुकी है। भाजपा, कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और आम आदमी पार्टी के बड़े नेता अपनी-अपनी पार्टियों के प्रत्याशियों को जीत दिलाने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं। चुनाव में अब सिर्फ तीन दिन का समय बचा है, इसलिए सभी दलों के वरिष्ठ नेता, मंत्री, विधायक और सांसद लगातार प्रचार अभियान में जुटे हुए हैं।
राज्य में 26 मई को 105 नगर निकायों के लिए मतदान होना है। इनमें आठ नगर निगम और 97 नगर परिषद एवं नगर पंचायतें शामिल हैं। चुनाव परिणाम 29 मई को घोषित किए जाएंगे। राजनीतिक जानकारों के अनुसार यह चुनाव करीब आठ महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव का माहौल तय करेंगे और सभी दलों के लिए जनता का मूड समझने का बड़ा आधार बनेंगे।
चूंकि यह चुनाव मुख्य रूप से शहरी वोटरों पर आधारित हैं, इसलिए सभी पार्टियां बेहद सतर्क दिखाई दे रही हैं। माना जा रहा है कि यह मुकाबला पंचायत चुनावों की तरह जातीय समीकरणों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विकास और राजनीतिक प्रदर्शन के मुद्दों पर लड़ा जाएगा।
भारतीय जनता पार्टी ने अपने प्रदेश स्तरीय पदाधिकारियों और कार्यकारिणी सदस्यों को अलग-अलग जिलों की जिम्मेदारियां सौंप दी हैं। प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़, राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ और केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत बिट्टू स्टार प्रचारकों के तौर पर विभिन्न जिलों में रणनीतिक बैठकों और जनसभाओं के जरिए पार्टी उम्मीदवारों के पक्ष में माहौल बनाने में जुटे हुए हैं।
शिरोमणि अकाली दल की ओर से पार्टी अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने खुद चुनावी मोर्चा संभाल रखा है। उनके साथ वरिष्ठ नेता डॉ. दलजीत सिंह चीमा और बिक्रम सिंह मजीठिया भी कई जिलों में प्रचार अभियान चला रहे हैं। सुखबीर बादल लगातार जनसभाएं कर मतदाताओं को अकाली दल के पक्ष में लामबंद करने की कोशिश कर रहे हैं।
कांग्रेस भी इस चुनाव को लेकर पूरी तरह सक्रिय नजर आ रही है। प्रदेश प्रभारी भूपेश बघेल, प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, सांसद एवं पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा, नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा और विधायक परगट सिंह समेत कई बड़े नेता लगातार चुनाव प्रचार में जुटे हैं और पार्टी प्रत्याशियों को जीत दिलाने के लिए रणनीति बना रहे हैं।
उधर, आम आदमी पार्टी के लिए यह चुनाव उसके मंत्रियों और विधायकों की लोकप्रियता की परीक्षा माने जा रहे हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार सभी मंत्रियों और विधायकों को उनके क्षेत्रों में आने वाले निकायों में जीत सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पार्टी नेतृत्व इन चुनाव नतीजों के जरिए यह आकलन करना चाहता है कि पिछले साढ़े चार वर्षों में उसके जनप्रतिनिधियों की जनता के बीच कितनी पकड़ बनी है। माना जा रहा है कि पंचायत चुनावों और निकाय चुनावों के प्रदर्शन के आधार पर ही आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण का फैसला किया जाएगा। खराब प्रदर्शन करने वाले विधायकों के टिकट पर भी खतरा मंडरा सकता है।