नई दिल्ली, 16 जून
आधार कार्ड के उपयोग को लेकर एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले को विचार के लिए स्वीकार कर लिया है, जिससे इसके दायरे और उपयोग को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। यह याचिका इस मांग के साथ दायर की गई है कि केंद्र सरकार, सभी राज्य सरकारों, केंद्रशासित प्रदेशों और भारत के चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाए कि आधार का इस्तेमाल केवल पहचान के प्रमाण के रूप में सीमित रखा जाए, न कि नागरिकता, निवास, पते या जन्मतिथि के प्रमाण के तौर पर।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, सभी राज्य सरकारों, केंद्रशासित प्रदेशों, चुनाव आयोग और भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) को नोटिस जारी किया है।
याचिका में तर्क दिया गया है कि आधार अधिनियम 2016 की धारा 9 स्पष्ट रूप से यह कहती है कि आधार नागरिकता या निवास का प्रमाण नहीं है, जबकि यूआईडीएआई के दिशा-निर्देश भी इसे केवल पहचान का दस्तावेज बताते हैं। इसके बावजूद स्कूल में दाखिले, संपत्ति लेन-देन, जन्म प्रमाण पत्र, राशन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस जैसे कई महत्वपूर्ण कार्यों में आधार को उम्र, पते और नागरिकता के प्रमाण के रूप में व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसे याचिका में कानून के दायरे से बाहर बताया गया है।
याचिका में विशेष रूप से नए मतदाता पंजीकरण फॉर्म-6 में आधार को जन्मतिथि और निवास प्रमाण के रूप में स्वीकार किए जाने को चुनौती दी गई है। दलील दी गई है कि यह प्रावधान न केवल आधार अधिनियम और यूआईडीएआई दिशानिर्देशों के खिलाफ है, बल्कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की व्यवस्थाओं से भी टकराता है।
इसके अलावा याचिका में आधार प्रणाली के दायरे पर भी सवाल उठाए गए हैं, जिसमें कहा गया है कि भारत में लंबे समय तक रह रहे विदेशी नागरिक भी आधार के लिए पात्र हो सकते हैं। इस स्थिति का दुरुपयोग कर अवैध प्रवासियों द्वारा आधार प्राप्त करने और फिर इसके आधार पर अन्य दस्तावेज हासिल करने की आशंका जताई गई है, जिससे पहचान प्रणाली की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है।
अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद यह मामला और गंभीर हो गया है और आने वाले समय में देश में आधार के इस्तेमाल को लेकर नियमों में बड़े बदलाव की संभावना पर भी चर्चा तेज हो गई है।