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आतंकवाद के दौर में पूरा पंजाब रोया था, फर्जी मुठभेड़ों में भी कई घरों के चिराग बुझ गए

Kashmirtimes 2026 07 14 Cknri15l Jaswant Singh Khalra And Jalil Andrabi
Published On: July 15, 2026

चंडीगढ़ , जुलाई 15

पंजाब एक बार फिर इतिहास की बहसों के केंद्र में है। ‘सतलुज’ फिल्म से जुड़े ताजा विवाद और शहीद मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा को लेकर चल रही चर्चाओं ने 1980 और 1990 के दशक के उस दर्दनाक दौर को एक बार फिर याद दिला दिया है। लेकिन इस बहस की सबसे बड़ी समस्या यह है कि अक्सर इतिहास को अधूरा पढ़ा और अधूरा सुनाया जाता है।

सच्चाई यह है कि पंजाब की त्रासदी को किसी एक पक्ष तक सीमित कर देना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। 1981 से 1995 के बीच पंजाब ने आज़ाद भारत के सबसे भयावह आंतरिक सुरक्षा संकटों में से एक का सामना किया। 1987 से 1992 के बीच हिंसा अपने चरम पर थी और 1990-91 सबसे अधिक रक्तपात वाले वर्ष साबित हुए।

इस दौरान कई खालिस्तानी आतंकी संगठन सक्रिय थे। दूसरी ओर पंजाब पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों ने व्यापक आतंकवाद विरोधी अभियान चलाया। इस संघर्ष में लगभग 20,000 से अधिक लोगों की जान गई, जबकि विभिन्न अध्ययनों के अनुसार यह संख्या 21,000 से 23,000 के बीच मानी जाती है।

अनुमानित आंकड़ों के अनुसार करीब 11,700 नागरिक, 1,700 से 1,800 पुलिस और सुरक्षा कर्मी, तथा लगभग 8,000 आतंकवादी मारे गए। मारे गए नागरिकों में 7,100 से अधिक सिख और करीब 4,500 हिंदू शामिल थे, जबकि कुछ मामलों में पीड़ितों की पहचान दर्ज नहीं हो सकी।

इस दौर में डीआईजी ए.एस. अटवाल, जनरल ए.एस. वैद्य, संत हरचंद सिंह लोंगोवाल सहित कई प्रमुख हस्तियों की हत्याएं हुईं। इसके अलावा पत्रकारों, सरपंचों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों को भी निशाना बनाया गया, जो उस समय की भयावहता का प्रमाण है।

दूसरी ओर मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा ने कथित गैर-कानूनी श्मशानों और लापता लोगों के मामलों को उजागर किया। वर्ष 1995 में उनका अपहरण हुआ और बाद में न्यायिक प्रक्रिया में पंजाब पुलिस के कुछ अधिकारियों को उनकी हत्या का दोषी ठहराया गया।

हालांकि पूरे राज्य में कथित फर्जी मुठभेड़ों और लापता व्यक्तियों की कुल संख्या को लेकर आज भी मतभेद हैं। खालड़ा द्वारा उठाए गए 25,000 मामलों के दावे की किसी एक व्यापक सरकारी जांच से पूरी तरह पुष्टि नहीं हो सकी है। विभिन्न आयोगों, अदालतों और जांच एजेंसियों ने अलग-अलग दायरे और आंकड़े प्रस्तुत किए हैं।

इतिहास को चुनकर नहीं पढ़ा जा सकता

यदि आज भी हम केवल आधा इतिहास याद रखेंगे, तो विभाजन और अविश्वास ही बढ़ेगा। लेकिन यदि हर पीड़ित को समान संवेदना के साथ याद किया जाए—चाहे वह आतंकवाद का शिकार हुआ हो या कानून के दुरुपयोग का—तभी पंजाब वास्तव में उस दौर से आगे बढ़ सकेगा।

पंजाब की कहानी केवल आतंकवाद बनाम राज्य की नहीं है, बल्कि उन हजारों निर्दोष लोगों की भी है जिन्होंने हिंसा के उस दौर में अपना सब कुछ खो दिया। यही संतुलित दृष्टिकोण और सामूहिक स्मृति भविष्य के पंजाब की सबसे मजबूत नींव बन सकती है।

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